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मकरसंक्रांति

मकरसंक्रांति
मकरसंक्रान्ति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है जो पूरे भारत में ये किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकरराशि पर आता है…
मकरसंक्रांति को खिचडी नाम से भी जाना जाता है और
खिचडी की विशेषता सबको पता है
खिचडी अगर “रसोईघर” मे पके तो बीमार के लिए “औषधि”का काम करती है और अगर वही “दिमाग” मे पके तो वह अच्छे भले इन्सान को “बीमार” कर देती है।
चावल और दाल के साथ मिल जाऐं तो यह अफेयर्स ही खिचड़ी कहलाता है।
एक पुरानी कहावत है जो हमारे बुढ़े बुजुर्ग खिचड़ी खाते वक़्त कहते थे की “ खिचड़ी के चार यार, दही पापड़, घी और अचार। कईयो के घर में तो हर शनिवार को खिचड़ी बनती है। खिचड़ी दक्षिण एशिया की खोज है यह सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान ,नेपाल और बंगलादेश में बड़े प्रेम से खायी जाती है वैसे खिचड़ी सच्चा समाजवादी भोजन है अमीर गरीब सभी प्रेम से खाते हैं गरीब बिना घी के भी प्रेम से हरी मिर्च के साथ खा लेता है।अमीर नखरे के साथ खाते है इसमें वो लोग भी होते है जिन्हें अपने घर में घी खाने से गैस होता है उन्हें दुसरे के घर बिना घी के स्वाद ही नहीं आता खैर जिस दिन घर में खिचड़ी पकती है गृहणी को आराम मिल जाता है लेकिन खिचड़ी के नखरे भी कम नहीं हैं ज्यादा पकने पर घुट जाती है कम पर दाल कच्ची रह जाती है या दाल अलग और पानी अलग |
वैसे संजीव कपूर की रैसिपी मे भी खिचड़ी दिख जाएगी लेकिन ये खिचड़ी हाईप्रोफाइल होती है ओर ग्लैमरस का तड़का भी लेकिन जो खिचड़ी नौजवान, छात्र, नई नौकरीवाले प्रोफेशनल, घनघोर अकेलों के घर में पकती है वो खिचड़ी न ही ग्लैमरस होती है और न ही तड़केदार लेकिन इस खिचड़ी के कम समय में बनने और भरपूर पेट भरने की गारंटी होती है।
एक छात्र हर चीज का त्याग कर सकता है पर खिचड़ी का नहीं। घर छोड़ने के बाद शहरों के बीहड़ों में भटकते हुए जिस चीज ने सहारा दिया वो खिचड़ी ही थी..मेरा ये मानना है कि अगर खिचड़ी जैसी कोई चीज नहीं होती तो अकेले रह रहे युवा भूखे मर जाते हालांकि इस बात की संभावना ज्यादा है कि कोई आलसी, नितांत अकेला आदमी खिचड़ी का आविष्कारक होगा और वो आगे चलकर शाहकार इंसानी सभ्यता में मील का पत्थर साबित हुआ।
मैंने तकरीबन आठ साल दिन और रात खिचड़ी खाकर दिन बिताए हैं… इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि मुझे न ही चावल बनाना आता था और न ही चपाती। मैं इतना आलसी और इतना कामचोर था कि मैंने कुकिंग सीखने की कोशिश ही नहीं की आखिरकार मुझ जैसे को खिचड़ी को ही गले लगाना था वैसे मुझे खिचड़ी बनानी भी नहीं आती थी लेकिन अल्प खिचड़ी ज्ञान कला ने ही मुझे खिचड़ी विशेषज्ञ बना दिया। उसकी वजह भी यह थी कि बाहर का खा खाकर जब पैसे खर्च हो गए तो मैंने घर पर ही खाना बनाने का साहसी फैसला लिया। दाल, चावल, अरहर, मलका, मूंग हर तरह की दाल ले आया। मैंने अपनी औकात के हिसाब से ये तय किया था कि मैं कभी भी चावल, दाल, चपाती, सब्जी नहीं बना सकता इसीलिए अलग अलग दाल और चावल लेकर आया।
मुझे पता था कि खिचड़ी में सबकुछ डाला जा सकता है और सभी डिशेज की जननी खिचड़ी ही है.. एक रूम के कमरों में कभी भी स्लैब वाला किचन नहीं होता। फर्श ही आपका किचन, आपका डाइनिंग टेबल, बेडरूम, ड्राइंगरूम होता है। कॉलेज के दिनों में पांच किलो वाली गैस बेहद फेमस थी..इस गैस के ऊपर बर्नर रखा होता है…इस वजह से इस गैस की ऊंचाई इतनी हो जाती है कि न पालथी मारकर, न ही उकड़ू बैठकर आप खाना बना सकते हैं।
मेरी पहली खिचड़ी बहुत ही क्रांतिकारी था नमक और हल्दी का हिसाब नही और पानी कम होने की वजह से पुरी खिचड़ी कुकर मे चिपक गई, खिचड़ी के लिए मैं इतना नॉस्टेलजिक था कि कॉलेज के बाद नौकरी के झंझट में फंसा तब भी मैंने खिचड़ी को नहीं छोड़ा। मैं ऑफिस में रात को करीब आठ बजे पहुंचता था और सबसे पहला काम खिचड़ी बनाने का ही करता था। मैं कुकर में डाले पानी के हिसाब से ये तय करता था कि आज दस सीटी वाली खिचड़ी बनानी है या बीस सीटी वाली…दस सीटी वाली खिचड़ी हमेशा गीली होती थी जो गले में आसानी से उतर जाती थी। बीस सीटी वाली खिचड़ी सख्त होती थी लेकिन ये तो पता है कि ज़िन्दगी मल्टीपल च्वॉयस क्वेश्चन नहीं है न ही ऑनलाइन एग्जाम है..जिंदगी दीर्घउत्तरिय प्रश्न है। जहाँ रोज परीक्षा देनी है
रोज सोचता है ये डिस बनाऊंगा पर दोपहर में जो मिनू होता वो शाम होते-होते खिचड़ी हो जाता उसका एक कारन ये भी था कि किचन में पड़े हुए कुकर धोएगा कौन।

खैर आप खिचड़ी का भोग लगाइये।

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